भोजन न पचने के कारण

पिये अधिक जल नित्य जो, बिना भूख जो खाय।
अधिक जगे सोवै अधिक शौच समय नहिं जाय।।
भय इर्ष्या अरु क्रोध में सदा लाभ अरु शोक।
कबहुं न भोजन पच सके, जो लघुशंका रोक।। अमृत सागर

दांत गिरने के कारण

अधिक गर्म जो पय पिये अथवा भोजन खाय।
तुरतहिं शीतल जल पिये, बत्तीसी झर जाय।।
सदा प्रकृति नियम सों, चमके दांत अपार।
कोयला मिट्टी के मले, देवे चमक बिगार।।

दाँत रक्षक उपाय

गर्म दूध सेवन करो, राखन चाहो दन्त।
तो शीतल जल पीजिये, कछुक समय के अन्त।।

दांतों का कीड़ा मरे

भोजन के उपरांत नित, मुख धोवें कई बार।
दांतन की जूठन सभी, दीजे अवस निकार।।
नमक महीन पिसाइये, अरु सरसों का तैल।
नित्य मले कीरा मरे, हटे दांत का मैल।।

दांत की टीशन बन्द हो

पिये तमाखू ग्राम्य जन, गुल महीन पिसाय।
प्रति दिन मंजन कीजिये, टीशन रोग नशाय।।

दांतों में पानी लगना बन्द हो

भोजनान्त शौचान्त में, दिन भर में कई बार
शीतल जल सों कीजिये, कुल्ला छः-छः बार।।
क्षमता सर्दी सहन की, बढ़े मसूढ़न माह।
कछुक दिवस अभ्यास सों, पानी लगहै नांह।।
गर्म दूध भोजन समय तथा गर्भ कछु खाय।
तब तह नियम न कीजिये, अपितु दांत हिल जाय।।

कभी बहरे न हों

प्रति महिने के अन्त में, तेल कान में डार।
श्रवण शक्ति अति तीव्र हो देय विकार निकार।।

 

आयु के अनुसार कान में तेल

जब लों शिशु दस वर्ष को, लसहुन तेल जलाय।
दस से सोलह वर्ष लों, तुलसी पात भुनाय।।
पुनः उम्र भर डालिये, सादा तेल मंगाय।
इस प्रकार के नियम सों, श्रवण शक्ति बढ़ जाय।।

 

कान बहना बंद हो

अर्ध छटाँक बबूल के फूल में तेल छटाक कइ मिलवावे।
माशा एक समुद्र फैन ले, अग्नि पर सारी वस्तु जलावे।।
जल जाय सभी तब छान के, तेल को बोतल में भर बन्द करावे।
कान में तेल को डाल गजेन्द्र मबाद रुके सब रोग नसावे।।

 

बहरापन दूर हो

सूखा फल ले बेल का, खूब महीन कराय।
गाय मूत्र में शान के, हलुआ सदृश्य बनाय।।
सरसों तेल मिलाय के, लीजै खूब जलाय।
छान कान में डालिये, श्रवण शक्ति बढ़ जाय।।

 

कर्णनाद (भनभनाहट)

मूली जड़ रस काढ़ के ताहि कान में डार।
कर्णनाद को दूर कर, बाढ़ै शक्ति अपार।।

 

सिर दर्द के लिए

सूखा गोबर खेत का लीजे खूब जलाय।
ताहि बुझाय महीन कर दूध मदार मिलाय।।

सूख जाय जब राख तब चूर्ण महीन बनाय।
शीशी में रख सूघिये शीश दर्द मिट जाय।। आरो. प्रकाश

घृत कपूर को लीजिये, एकहि साथ मिलाय।
सिर माथे में रगड़िये देवे दर्द मिटाय।। अनुभूत

 

आयुर्वेदिक दोहे

दही मथें माखन मिले, केसर संग मिलाय।
होठों पर लेपित करें, रंग गुलाबी आय।।

बहती यदि जो नाक हो, बहुत बुरा हो हाल।
यूकेलिप्टिस तेल लें, सूंघें डाल रुमाल।।

अजवाइन को पीसिये , गाढ़ा लेप लगाय।
चर्म रोग सब दूर हो, तन कंचन बन जाय।।

अजवाइन को पीस लें, नीबू संग मिलाय।
फोड़ा-फुंसी दूर हों, सभी बला टल जाय।।

अजवाइन-गुड़ खाइए, तभी बने कुछ काम।
पित्त रोग में लाभ हो, पायेंगे आराम।।

ठण्ड लगे जब आपको, सर्दी से बेहाल।
नीबू मधु के साथ में, अदरक पियें उबाल।।

अदरक का रस लीजिए, मधु लेवें समभाग।
नियमित सेवन जब करें, सर्दी जाए भाग।।

रोटी मक्के की भली, खा लें यदि भरपूर।
बेहतर लीवर आपका, टी.बी भी हो दूर।।

गाजर रस संग आँवला, बीस औ चालिस ग्राम।
रक्तचाप हिरदय सही, पायें सब आराम।।

शहद आँवला जूस हो, मिश्री सब दस ग्राम।
बीस ग्राम घी साथ में, यौवन स्थिर काम।।

चिंतित होता क्यों भला, देख बुढ़ापा रोय।
चौलाई पालक भली, यौवन स्थिर होय।।

लाल टमाटर लीजिए, खीरा सहित सनेह।
जूस करेला साथ हो, दूर रहे मधुमेह।।

प्रातः संध्या पीजिए, खाली पेट सनेह।
जामुन-गुठली पीसिये, नहीं रहे मधुमेह।।

सात पत्र लें नीम के, खाली पेट चबाय,।
दूर करे मधुमेह को, सब कुछ मन को भाय।।

सात फूल ले लीजिए, सुन्दर सदाबहार।
दूर करे मधुमेह को, जीवन में हो प्यार।।

तुलसीदल दस लीजिए, उठकर प्रातःकाल।
सेहत सुधरे आपकी, तन-मन मालामाल।।

थोड़ा सा गुड़ लीजिए, दूर रहें सब रोग।
अधिक कभी मत खाइए, चाहे मोहनभोग।।

अजवाइन और हींग लें, लहसुन तेल पकाय।
मालिश जोड़ों की करें, दर्द दूर हो जाय।।

ऐलोवेरा-आँवला, करे खून में वृद्धि।
उदर व्याधियाँ दूर हों,जीवन में हो सिद्धि।।

दस्त अगर आने लगें, चिंतित दीखे माथ।
दालचीनि का पाउडर, लें पानी के साथ।।

मुँह में बदबू हो अगर, दालचीनि मुख डाल।
बने सुगन्धित मुख, महक, दूर होय तत्काल।।

कंचन काया को कभी, पित्त अगर दे कष्ट।
घृतकुमारि संग आँवला, करे उसे भी नष्ट।।

बीस मिली रस आँवला, पांच ग्राम मधु संग।
सुबह शाम में चाटिये, बढ़े ज्योति सब दंग।।

बीस मिली रस आँवला, हल्दी हो एक ग्राम।
सर्दी कफ तकलीफ में, फ़ौरन हो आराम।।

नीबू बेसन जल शहद, मिश्रित लेप लगाय।
चेहरा सुन्दर तब बने, बेहतर यही उपाय।।

मधु का सेवन जो करे, सुख पावेगा सोय।
कंठ सुरीला साथ में, वाणी मधुरिम होय।।

पीता थोड़ी छाछ जो, भोजन करके रोज।
नहीं जरूरत वैद्य की, चेहरे पर हो ओज।।

ठण्ड अगर लग जाय जो नहीं बने कुछ काम।
नियमित पी लें गुनगुना, पानी दे आराम।।

कफ से पीड़ित हो अगर, खाँसी बहुत सताय।
जवाइन की भाप लें, कफ तब बाहर आय।।

जवाइन लें छाछ संग, मात्रा पाँच गिराम।
कीट पेट के नष्ट हों, जल्दी हो आराम।।

छाछ हींग सेंधा नमक, दूर करे सब रोग।
जीरा उसमें डालकर, पियें सदा यह भोग ।

 

शरीर में गर्माहट बनाए रखने के लिए इन 7 चीजों का करें सेवन

  1. गुड़ – सर्दी में जुकाम और खांसी होने पर गुड़ का काढ़ा पिलाया जाता है, क्योंकि यह शरीर को गर्माहट देता है। रोजाना गुड़ का सेवन करते रहने पर आपको सर्दी के दुष्परिणाम नहीं झेलने पड़ेंगे।
  2. काली मिर्च – इन दिनों में काली मिर्च को अपनी डाइट में शामिल करें। चाहें तो सूप, सलाद और स्प्राउट के साथ या फिर लाल मिर्च की जगह खाने में इसे शामिल करें।
  3. हल्दी – सर्दी से बचने के लिए यह भी औषधी के रूप में प्रयोग की जाती है। आप हल्दी का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा कीजिए और शरीर में गर्माहट बनाए रखिए। यह एंटीबायोटिक का काम भी करेगी।
  4. लहसुन – लहसुन एक बेहतरीन एंटीबायोटिक होने के साथ-साथ सर्दी-जुकाम में प्रयुक्त होने वाली औषधी भी है। ठंड के दिनों में लहसुन की चटनी, सब्जी बनाई जा सकती है।
  5. मेथी – मेथी दाने से बनाए जाने वाले लड्डुओं का सेवन खास तौर पर ठंड में किया जाता है। यह शरीर में गर्माहट बनाए रखने में मददगार है। मेथी की हरी सब्जी का भी ज्यादा से ज्यादा सेवन करना इन दिनों में फायदेमंद होगा।
  6. सूखे मेवे – सूखे मेवों का सेवन करना भी ठंड से बचाव के लिए बेहद मददगार साबित होगा। अगर इन्हें गुड़ और घी के साथ मिक्स करके लड्डू बनाकर सेवन करेंगे तो यह और भी सेहतमंद हो जाएंगे।
  7. शहद – शहद का सेवन करना यूं तो लाभदायक होता ही है, ठंड के दिनों में यह विशेष रूप से लाभदायक होगा। गर्म पानी के साथ इसका सेवन वजन कम करने में भी मददगार है और फुर्ती लाने में भी।

औषधि वृक्षों के नाम और परिचय एवं चिकित्सा में उनके उपयोग

बुन्देलखण्डी औषधीय वृक्षों का परिचय :

भारत एक महान प्राकृतिक संपदा से आच्छादित देश है। हमारी इस धरोहर में उपलब्ध वन्य पौधे, दूध, खनिज जड़ी बूटियां हमारे जीवन सफल करने के आधार हैं। इन्हीं पर आधारित है हमारी अपनी भारतीय चिकित्सा (आयुर्वेद) जिसका कि स्वरूप प्राकृतिक है। हमारे मध्यप्रदेश में 758  ऐसे पौधें हैं जिनका कि अत्यंत महत्व है। साथ ही वे संपूर्ण प्रदेश खासकर बुन्देलखण्ड में बहुत पाये जाते हैं एवं इनकी भरपूर खेती की संभावनायें भी है। इनमें अनेकों पौधे प्राकृतिक रूप से निरंतर पाये जाते आ रहे हैं। दलहनें – धान्य, पंचक, सौंप, जीरा, मिर्च, मैथी, तैलीय पौधे, एरण्ड। पुष्प- गुलाब, चमेली, करौंदा, गेंदा, सदासुहागन इत्यादि असगंध, सर्पगंधा, रोजाघांस, एनीसीड, खस इत्यादि।

फलदार पौधे- सेम, लौकी, नीबू, संतरा, रसभरी, बिही, तरबूज, जामुन, आम, अनार, गूलर, इत्यादि अनेक साथ ही अनकों जड़ी बूटी पौधे, शंखपुष्पी, अमलतास, गुडुची, सतावर, धतूरा, धनिया, अर्जुन, अशोक, सेमल, पलाश, खैर, कांचनी, बबूल, शिंकाकाई, रीठा, आधाझारा, कंठाला, अकोला, छोटी चौलाई, धीरा, कचनार, मदार, कसौंदी, चकूदा, लगौड़ा, दूधी, कपित्थ, कालीहारी, इन्द्रयव, चिरौल, वच, मेंहदी, महुआ, बकुल, लाजवंती, कमल, कनेर, हरसिंगार, नागफनी, ईसबगोल, करंज, सोमलता, भटकटा, कुचला, सहदेवी, धबई, गोखरू, बेरी, प्याज, लहसुन, सीताफल, पपीता इत्यादि अनेकों पौधें बहुतायत से पैदा होते हैं। साथ ही इन्हीं को एक जगह एकत्रित कर खेती भी की जाना संभव हैं। नीम महानीम, यूकेलिप्टस, बांस, आंवला, बहेड़ा, हर्र, पीपल, पीपलामूर, इत्यादि ऐसे अनेकों पौधें यहाँ लगाये जाकर इनकी व्यवस्थित खेती को गृह उपयोगी एवं विदेशी आयात-निर्यात को बढ़ावा देने हेतु पैदा करना संभव है।

आज बुन्देलखण्ड में उपर्युक्त पौधों के सिवाय ग्रामीण अंचलों में तथा वनवासी औषधि के रूप में व आहार के रूप में अनेकों ऐसे पौधों का प्रयोग अपने स्वास्थ्य सुरक्षा हेतु करते आ रहे हैं। निश्चित इन सभी मान्यताओं को स्थापित करते हुए, बुन्देलखण्ड में भरपूर पाई जा रही है। मैं इन जड़ी-बूटियों की जानकारी प्रस्तुत करना भी उचित मानता हूँ।

जैसे- मूसली, हंसिया, डाफर, वायविडंग, अधनथू, असगंध, गुलाखारी, तम्बाकू, गगेरूआ, मदनमस्त, मूसली, श्यामा तुलसी, शंखपुष्पी, भृंगराज, कालमेघ, पथरचटा, बड़ी कटई, सफेद गुमची, चमेली, गुड़मार, (फूलकटु), किरकिचयाउ, छेवला फल, कहीरा, किरवार, काली मुरीसर, तुकमलंगा, सुलैसा, अफो, नाय, धूलिया, कामराज, एलमूसरी, हड़जोड़ सुरपत्र, बोरियाधोवली, ऐंठनी, मरोड़फल्ली, गंभारी, बेल, कसौंदी, पित्तापापड़ा, चित्रक, रात्ना, गंवारपाठा, जटामांसी, चिरायता, कुटकी, निर्मली इत्यादि, अनेकों ऐसी जड़ियों की खेती व कृषि की जाना संभव है। चंदन, खदिर, उटुम्बर, इमली, अनार आदि भी अच्छे से पैदा किए जा सकते हैं।

उपरोक्त खेती को करते हुए दोहरा लाभ अर्जित करने हेतु मधुमक्खी पालन कार्य कर खेती को तो बढ़ावा, उन्नत बीज का निर्माण, फसलों में बढ़ोत्तरी प्राप्त होगी ही, साथ ही उत्तम पौष्टिक आयुर्वेदीय अनुपान एवं खाद्य पदार्थ भी प्राप्त हो सकेगा। जबकि हम समन्वित कार्यक्रम शहद उत्पादन हेतु भी करें।

मधुमक्खी उत्पादों पर यदि हम ज्ञानवर्धन करें तो पायेंगे कि यह एक पौष्टिक आहार, टानिक औषधि है। परागकण, रायल जैली, छत्ता, गोंद, मृत, मधुमक्खी विष, मोम व खासकर शहद का उत्पादन होता है। यह कार्य लघु व सीमांत किसानों को घरेलू कुटीर उद्योग एवं स्वरोजगार भी स्थापित कराता है। जंगलों व खेती पर आधारित भी होता है। यदि उचित प्रशिक्षण एवं संतुलित खेती से जुड़कर यह कार्य किया जाये तो निश्चित विदेशों में मांग पर शहद पौधों के अनुसार उपलब्ध कराया जाना संभव है।

भूमिहीन किसानों एवं खेतिहर मजदूरों को भूमि में फल-फूल, तेल बीजों के पौधे, कृषि व बागवानी के साथ मधुमक्खी पालन का कार्य भी संपूर्ण व्यवस्थित प्रशिक्षण के साथ कराया जाकर ये सभी कार्य संभव है। आधुनिक बाक्सों में मधुमक्खी पालन में हम पाते हें कि एक बाक्स 100 लीटर तक शहद प्रति वर्ष पैदा करता है। बुन्देलखण्ड क्षेत्र में खेती के साथ इस कार्य का भरपूर उपयोग आज किया जाना भी संभव है।

शहद एक प्राकृतिक अवस्था है। इसका शोधन तथा मानकीकरण के आधार पर जनमानस की मांग पर उपलब्ध किया जाना भी संभव है। यह एक प्राकृतिक भोजन व औषधि भी है। इसका रासायनिक संगठन भी ज्ञान कराता है कि इसमें फ्रुक्टोज, ग्लूकोज, सुक्रोज, प्रोटीन, वसा, खनिजद्रव, अम्ल, ऐंजाइम्स, एमाइनो एसिड, बीकाम्पलेक्स तथा विटामिन सी एवं अनेकों शक्तिवर्धक तत्व भी होते हैं।

हमारे देश का आम आदमी 10 से 20 ग्राम शहद वर्ष भर में सेवन करता है। अरब देशों में 1.5 किलो तक, यूरोप में 2 किलो तथा अमेरिका कनाड़ा आदि में 1.75 किलो शहद प्रति व्यक्ति सेवन होता है। हमें भी इस कार्य को अधिक व्यवस्थित खेती आधारित वृहत स्तर पर करना उपयोगी होगा। आज शहद पर आधारित अनेकों उद्योग भी स्थापित हो सकना संभव है। परन्तु इस कार्य को जबकि आयुर्वेद के माध्यम से प्रचार-प्रसार नहीं प्राप्त होगा तो लाभार्जन भी संभव नहीं है। वर्तमान वैज्ञानिकी ज्ञान आधारित इसकी औषधि व खाद्य पदार्थ के रूप में मानकीकरण जानकारी प्रत्येक पौधे अनुसार शहद के गुणों का ज्ञानार्जन कराने में यह एक बहुत बड़ा विदेशी धनार्जन का साधन हम आयुर्वेद के माध्यम से कर सकते हैं।

आज शहद के शरबत, जैम, शक्कर, जैली, शहददूध, शहद स्कैप, शहद ब्रेड, शहद सलाद, शहद सास, शहद छुलका, बिस्कुट, रायल जैली, छत्ता गोंद, मोम, परागकण आदि का निर्माण होना संभव है।

रायल जैली दीपन, कंठसाफ करने वाली, आरोग्य प्रदान करने वाली, वयः स्थापन करते हुए शक्तिवर्धक भोजन व पेय के रूप में प्रयोग होता है। इसके सिवाय पाउडर, पेस्ट, सौन्दर्य प्रसाधन, लिपिस्टक, चेहरे की झुर्रियों को मिटाने में सहयोगी होता हैं। रायल जैली दूधिया स्राव व संतुलित पौष्टिक आहार है। इन्हें छत्तों में एकत्रित किया जाता है। इसमें पराग दीपन, क्षुधा व शक्तिवर्धक होते हैं। ये शाकाहारी एवं संपूर्ण प्रोटीन इसमें होते हैं। प्राकृतिक प्रसाधन में इसका उपयोग होता है।

छत्ता गोंद – यह गहरा चिपचिपा पदार्थ है जो मधुमक्खकियों द्वारा पेड़ पौधों की कलियों व छात्तों से एकत्रित किया जाता है। इसका प्रयोग छत्ते की दरारों को भरने में होता है। यह मधुमोम व छत्ता गोंद अत्यंत उपयोगी होता है।

मोम का प्रयोग मोमबत्ती, पालिश, वार्निश, दंत चिकित्सा, दवाईयों, धातु ढ़ालने व कला में उपयोग होता है।

अभी हमारे वनवासी एवं कृषक इस कार्य को कर रहे है। परन्तु यदि यह कार्य आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों की खेती के साथ जोड़कर व्यवस्थित प्रशिक्षण एवं ज्ञान रखकर किया जावे तथा विश्व की मांग, व्यापार एवं जनहित में किया जावे तो निश्चित अत्यंत हितकारी सर्वश्रेष्ठ होगा। यह रोजगार उन्नत कृषि व आयुर्वेद की सुरक्षा भी प्रदान करेगा।

हमारे देश में शहद एक पूज्य पदार्थ भी माना गया है जन्म, विवाह, त्यौहारों, धार्मिक संस्कारों एवं यहाँ तक मृत्यु पश्चात् भी यह उपयोगी होता है। धावकों खिलाड़ियों, पर्वतारोहियों, गोताखोरों, अस्पताल में भरती रोगियों, यात्रियों के साथ लंघन, लेखन, पत्र एवं अनुपान व खाद्य पदार्थ के रूप में उपयोग होता है। खासकर औषधि निर्माण में वैद्य हकीम इसकी भरपूर सलाह देते हैं। यदि यह प्रचार व प्रसार वृहत स्तर पर होता रहे तो आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों की खेतीकर यह कार्य किया जाना संभव है। शहद के रख रखाव को भी आधुनिक व्यवस्था पर ध्यान रखना होगा।

घरेलू उद्यान- मेंहदी व निर्गुंडी की फेंसिग, तुलसी, वचा, धृतकुमारी, मोगरा, गुलाब, मनी प्लांट, चमेली, शतावरी, जलकुसुम, श्वेत व पीत करवीर, रातरानी, सारिवा, केला, पपीता, अनार, अमरूद, सीताफल, पारिजात।

घर के आसपास की रिक्त भूमि – अश्वगंधा, वासा, मकोय, भारंगी, भृंगराज, शालपर्णी, पष्निपर्णी, मेषवर्णी, धातकी, काली मूसली, एरण्ड, रक्त करवीर, श्योनाक, अगस्त्य, कांचनार, शिग्रु, मीठा नीम, महानिम्ब, गुडूची।

औद्योगिक सार्वजनिक उद्यान- अश्वस्थ, उदुम्बर, वट, अर्जुन, अशोक, बकुल, आरग्वध, कांचनार, करंज, सप्तपर्ण, पिलखन (पाख) चन्दन, रक्तचन्दन, शहतूत, कौंच, आम, जामुन आमलकी, निम्ब।

सड़क के किनारे- अश्वत्थ, वट, उदुम्बर, महुआ, निम्ब, कदम्ब, कपित्थ, आरग्वध, गुलमोहर, शाल्मलि, ईमली, अर्जुन, हरीतकी, विभितकी, अग्निमंथ, पीलू, करंज, शीशम, शिरीष, वरूण, पलाश, खजूर, खदिर, बबूल।

वनोषधि व्याधि
सम्भालु (निर्गुडी)गृध्रसी
मेंहदीदाह, प्रमेहनाशक, केशरंजक एवं वर्धक
तुलसीप्रतिश्याय, विषमज्वर, वात श्लेष्मिक ज्वर
मख्याविषघ्न, बिच्छूदंश, पीनस, कर्णपाक
वचाअपस्मार, उम्माद, कफज, हृदयरोग
धृतकुमारीसारक, कामला, गुल्मरोग
सारिवारक्तशोधक, त्वकरोग, कुष्टरोग
श्वेत व रक्त करबीरकृमि व कुष्ठ नाशक, बिच्छुदंश में
पीत करबीरहृदयरोग
चमेलीमुखपाक, कर्णपाक
शतपत्री (गुलाब)दाह व रक्त पित्त नाशक, हृद्य
मोगराकुष्ठ, मुखपाक
कदम्बमूत्रकृच्छ, दाह, रक्त रोग नाशक
पारिजातगलगंड, कण्डू, ग्रध्रसी, सर्पदंश
अगस्त्यचातुर्थिक, ज्वर, अर्धावभेदक
गुडु़चीरसायन, आमवात, जीर्णज्वर, कामला
शतावरीस्तन्यवर्धक, अम्लपित्त, परिणामशूल
अश्वगंधबल्य, रसायन, स्मृतिवर्द्धक, वात व्याधि
वरूणमूत्रकृच्छ, मूत्राश्मरी नाशक
शिरीषश्वासरोग
वासा (अडूसा)कास, श्वास, रक्तपित्त, कफज्वर
जपाकुसूमपरिवार कल्याण हेतु
भृंगराजकेशरंजक, मुखपाक, स्वरभेद, नेत्रहितकारी
भारंगीश्वासरोग, हिक्का, गंडमाला, मूषकविष
काली मूसलीवीर्यवृद्धि, पोष्टिक
मेषश्रृगीचक्षुष्य, शोधहर, वमनहर, कृमिहर
काकनाची (मकोय)शोथ, कुष्ठ उरूस्तभ, विसर्पनाशक
पृष्निपर्णी (पिटवन)अस्थिभग्न, रक्तातिसर
शालपर्णी (सारिवन)अर्धाविभेदक, गुढ़गर्भ
असगंध (अमलतास)मृदूरेचक, त्वकरोग, गंडमाल
निम्ब (नीम)त्वकरोक जीवाणुनाशक
महानिम्बप्रसूतज्वर, मुखपाक
सप्तपर्णविषमज्वर
बिल्वग्राही, अतिसार, मधुमेह, कर्णरोग
अश्वगंधापर्यावरणशोधक, वमन, हिब्का, क्षतकास
अर्जुनहृदयरोग, रक्तपित्त
बटगर्भधारक, धातुपुष्टि, रक्तपित्त
उदुम्बरगर्भसंधानकारक, व्रणरोपक, पित्तज्वरनाशक
शिग्रु (सहिजन)प्लीहावृद्धि, गुल्म, कृमिनाशक
करंजत्वकरोग, विचर्चिका, गंडमाला
कांचनारगंडमाला, अग्निदीपक
बकुल (मोरसली)दंतरोग, श्वेतकुष्ठ, विषदोष
पिलखन (पाखर)व्रण, योनिरोग, दाह, पित्त नाशक
अशोकरक्तप्रदर, श्वेतप्रदर, रक्तार्शनाशक
श्योनाकप्रमेह, रक्तातिसार, रक्तस्त्राव, व्रण
कौचवृष्य, धातु पौष्टिक
कपित्थहिक्का, श्वासरोग, शीत पित्त शामक
ईमलीसारक, रूचिकारक, भांग का नशा निवारक
अग्निमथ (अरणी)शोथ, वसामेह, शत पित्त
पीलूमल भेदक, गुल्मनाशक
धातकीगर्भस्थापक, रक्तपित्त, अतिसार नाशक
शाल्मलि (सेमल)रसायन , रक्तपित्त, अतिसार नाशक
पलाशकृमि, कडू, मूत्राघात,
खदिरत्वकरोग, कुष्ठ भंगदर
बबूलग्राही, कुष्ट, कृमि, विष नाशक
हरीतकीमृदूरेचक, त्रिदोपनाशक, हिक्का, गुल्म, वातरक्त नाशक
विभितकीसारक, पाण्डू, कृमि स्वरभंग, नासा, नेत्ररोग नाशक
आमलकीवृष्य, वीर्यवर्द्धक, प्रमेह, रक्तपित्त नाशक
सीताफल, मूत्राघात, वहशामन, लीख नाशक
अनाररक्तर्श, नकसीर, अरूचिनाशक
चन्दनमूत्रकच्छ, मूत्रादाह, प्रमेह, प्रदर
रक्तचन्दनअग्निदग्ध, व्रण
पपीतापाचक, यकृतप्लीहा हितकारी
महुआवृष्य, शीतल, रक्तपित्त नाशक
जामुनमधुमेह, मुखरोग, उदरोग, अतिसार नाशक

 

बुन्देलखण्ड में आयुर्वेदिक चिकित्सा में तेलों के महत्व

आयुर्वेद ही एक मात्र चिकित्सा है, जो विश्वव्यापी आपके घर से संपूर्ण पर्यावरण में भरपूर एवं दीर्घायु किये जाने की कल्पना यही चिकित्सा शास्त्र रखता है। वात्सायन ने भी ‘कामसूत्र’ में कहा है-

उत्सादने संवाहने वेसा मर्दने व कौशलम्।

मानव शरीर के प्रायः हाथ, पैर, नाभि, कान नासिका, नेत्रों, कमर, भाल, बालों, चेहरे में प्रायः तेल मालिश का बहुत महत्व रहा है। हमारे देशवासी ज्यादातर उत्तर में सरसों, मध्य पश्चिम पूरब में तिल मूंगफली एवं दक्षिण में प्रायः नारियल के तेल या जैतून तेल गौघृत या कुछ औषधियों से पकाया तेल प्रतिदिन की मालिश व विविध रोगोपचार में करते हैं। प्रायः कुछ लोग हल्दी, बेसन, तेल, बटना (उबटन) शरीर पर मलते हैं। कुछ लोग चमेली तेल की मालिश करते हैं।

इससे शरीर का रंग निखरता है, शरीर के रूंआ (लोक, बाल), दूर होते हैं। भारतीय परिवारों में नन्हें मुन्नों व प्रसूताओं के अंग प्रत्यंगों मालिश का प्रावधान प्रायः होना है। दाइयां या माइयां करती हैं। नवजात शिशु की मालिश तो धूप में बच्चे को लिटाकर प्रायः करते हुये घरों में पाया जाता है। इस तरह तेल मालिश से उनके अंग प्रत्यंग भी खुलते हैं। बच्चे चेतन्य तथा पुष्ट होते हैं। घने लोम होने पर उबटन लगाते हैं। बच्चों का रंग भी निखर जाता है।

तेल मालिश से प्रतिदिन शरीर पर बाह्य वातावरण के अशुद्ध तत्व धुंआ, धूल, रासायनिक तत्व जिनका त्वचा पर खतरनाक असर होता है जिसे त्वचा पर दाह, शुष्कता, रूक्षता, शीत उष्ण प्रभाव होने लगता है। यह स्थिति यदि प्रतिदिन मालिश की जावे तो शरीर को सुरक्षित रखती है। अभ्यंग के लिए हेमंत बसंत ऋतु तक तेल की गर्म कर अभ्यंग होता है जिससे ठण्ड का शरीर पर असर नहीं होता है। साथ ही ठंड से झुलसी हुई चमड़ी व उसमें स्फुटन नहीं हो पाती है। तेल मालिश के पूर्व शरीर का शोधन कर गर्म जल से सफाई करना बेहतर रहता है।

शरीर के विभिन्न अंगों में ऊंगलियों व हथेली से हल्के हाथों से हाथ पर रोल लेकर मालिश एवं तेल अंगों में फैलाने की प्रथा है।

आयुर्वेद में तेलों को मानव जीवन के शुभारंभ से ही उपयोगी व रोगवार बनाने का व्यापक ज्ञान समाहित है। मालिश के लिए, तेल, दूध, मलाई, घी इत्यादि का अलग-अलग प्रयोग होता रहा है। प्रायः कहावतों में कहा भी गया है कि घी दूध से तेल दस गुना प्रभावी होता है।

‘‘घृतात् दशगुणं तेलं मर्दनात् न तुंभ क्षगात्।’’

पिपलायन जो प्रातः ही तेल लगाते अंग।

अति घर्षण के साथ में तभी सहीं अभ्यंग।।

तभी सही अभ्यंग वज्रसम वपु बन जाता।

होत पलित बलि नाश वदन सुंदर दर्शाता।।

लहते वे दीर्घायु रहत नित ही मुदितायन।

ज्यो रहते नव ज्वान रहित चिंता पिपलायन।।

प्रायः एक या दो दिन छोड़कर अभ्यंग होना चाहिए। सप्ताह में एक बार भी तेल मालिश अच्छा रहता है। शरीर के मांसल अंगों, पीठ, नितंब व बाहों में जोर डालकर चेहरे हाथ व सिर में धीरे धीरे मालिश करना चाहिए। इसके बाद उबटन लगाकर शरीर को घिसकर स्नान करना चाहिए।

  विभिन्न क्षेत्रों में अलग अलग तेल विभिन्न मौसमों में प्रयोग होते हैं। जैसे शीत ऋतु में सरसों, समशीतोष्ण ऋतु में तिल व मूंगफली, उष्ण क्षेत्र में एरण्ड या नारियल तेल विभिन्न औषधियों में मिलाकर लगावे तो यह लाभकर होता है।

बुन्देलखण्ड में उपयोगी शास्त्रानुसार निर्मित तेल के प्रयोग रोगानुसार

क्र.रोगतेल प्रयोग
1चर्मरोगचालमोगरा तेल, निंबतेल, सोमराजी, महामरिच्छयादि तेल
2बाल झड़ना (खलित्य पालित्य)महाभृंगराज, ब्राम्ही आंवला, हिमकल्याण तेल
3शिरःरोगषड्बिंदु, अणुतेल
4दर्द शामकमहा नारायण, चंदन बला लाक्षादि, महाभाष, महा विषगर्भ तेल, वातीना तेल इत्यादि
5सूखा रोगबला तेल, महाभाष
6शिरःशूलब्राम्ही आंवला, हिमसागर, रामेश्वारादि
7श्यामलताचंदन तेल, कुकुंमाद्य तेल, विष्णुतेल
8विवर्णताबाकुची, कुंकुमाद्य तेल
9दाहमधुष्ठार्दि तेल
10दुर्बलतामहाभाष, श्री गोपाल तेल
11जोड़ों में दर्दप्रसारिणी व पंचगुण तेल
12मानस रोगोंज्योतिष्मती, मालकांगनी तेल
13नेत्रज्योतिष्मति तेल, निंब तेल
14कर्ण रोगबिल्वादि तेल, कर्णप्रिया
15दंत रोगलवग तेल
16कामोत्तेजकविभिन्न जड़ी बूटियों से निर्मित तेल

इन तेलों में अतिरिक्त विभिन्न औषधि पौधों के मिश्रण से भी अनेकों अनुभव के आधार पर विभिन्न रोगों में प्रभावी स्थान ये रखते हैं जैसे-

  1. मैथी, लहसुन, हींग, अंडे की जर्दी, धतूरा व एरण अजवाइन के साथ विभिन्न तेलों सरसों, तिल, नारियल इत्यादि के साथ गरम कर प्रयोग किये जाते हैं।
  2. विभिन्न तथा विशेष रोगों की चिकित्सा हेतु सिद्ध तेल घृत का विधान है। उसमें निर्धारित अनुपात में औषधि क्वाथ मिलाकर मंदाग्नि से ओटना चाहिए जब तक तेल शेष न रह जाये। जटामांसी, भृंगराज, चंदन, ब्राम्ही, शंखपुष्पी, अश्वगंधा इत्यादि के तेल पंचाग के रूप में उपयोग होता है।
  3. शुद्ध सरसों तेल लहसुन, अजवाइन के साथ गरम कर कान दर्द होने पर बूंद बूंद डालने पर लाभकारी रहता है।
  4. अनेकों तेल विभिन्न पशुओं व कीटों से बनाये जाते हैं जैसे सर्प, बिच्छू, बर्र, मधुमक्खी इत्यादि से।

 

तेल मालिश के शरीर पर उपयोग –

  1. सोते समय पाद तल पर तेल मालिश, प्रातःकाल सिर में तेल मालिश करने से दृष्टि विकास होता है, नजला जुकाम नहीं होता है।
  2. काहू का तेल की मालिश से निद्रा अच्छी आती है। अनिद्रा नष्ट हो जाती है। इस तेल मालिश से शरीर में कफ का कम होना, वर्बी हटना, शरीर का रंग निखरता है। अंग पुष्ट व दिव्य देह हो जाती है।
  3. कुश्ती के पहले सारे शरीर पर तेल मालिश व कुश्ती के बाद शुष्क घर्षण मालिश कराते हैं।
  4. स्नान करने के पहले मालिश व व्यायाम के पश्चात मालिश लाभकारी होती है।
  5. प्रसूता स्त्रियों के अंग प्रत्यंगों की मालिश करने से वे मांसपेशियों को स्वस्थ कर पाती हैं।

 

तेल मालिश का अनुपयोगी –

  1. जो विभिन्न रोगों से ग्रस्त व किसी इन्फेक्शन या उपसर्ग युक्त है, उन्हें तेल मालिश न करने दें।
  2. त्वक रोग ग्रस्त कोई स्राव जिनके शरीर से हो रहा है इन्हें तेल का प्रयोग न करने दें हाथ से इनके रोगों के फैलने की संभावना है।
  3. शरीर के स्वच्छ अंगों पर ही मालिश करना चाहिए।
  4. शरीर पर वृण (चोट) या घाव हो तो उन पर ज्यादा मालिश नहीं करना चाहिए।

तेलों का हमारे जीवन में अत्यंत प्रभावकारी स्थान है। यह कहावत है कि ‘‘न नौ मन तेल न राधा नाचेगी’’ जब ये कहावतें ही हमें अवगत कराती हैं कि हजारों वर्ष पूर्व से तेल मानव जीवन की अनेकों आवश्यक जरूरतें पूरी करता आ रहा है। तेल नाना प्रकार के व्यंजन बनाने में शरीर के स्वास्थ्य को स्वस्थ रखने में, सुदंरता, सुडौलता एवं दीर्घायु कराने में भोजन में, नाना प्रकार की व्याधियों में यह एक प्रभावी औषधोपवार भी है। साथ ही यह विभिन्न औषधीय पौधों के मिश्रण से हमारे शरीर पर रोगों की चिकित्सा में प्रभावी स्थान भी रखता है। आज के अत्याधुनिक युग में तो मशीनों, कल कारखानों, उद्योगों, वाहन, रेल, हवाई जहाज, पानी के जहाज इत्यादि में तेल एक अत्यंत उपयोगी होता जा रहा है। हमारे देश व विदेशों में इसका आर्थिक अर्जन हेतु व्यापक व्यापार भी हो रहा है। अतः यदि हम यह कहें तो अतिश्योक्ति नहीं हो कि ‘‘तेल ही जीवन है।’’

 

त्रिफला चूर्ण (हाजमा के लिए)

हर बहेड़ा आवला लीजै खूब पिसाय।
त्रिफला चूर्ण बनाइये काला नमक मिलाय।। चरक
ऋतु के अनुसार त्रिफला सेवन विधि

 

शरद ऋतु में त्रिफला

कार्तिक से अरु माघ तक त्रिफला गुड़ संग लेय।
भोजनान्त नित खाइये शक्ति बुद्धि कर देय।।

 

ग्रीष्म ऋतु में त्रिफला

फागुन से अरु जेठ तक, त्रिफला मिश्री संग।
भोजनान्त नित खाइये रहे निरोगी अंग।।

 

वर्षा ऋतु में त्रिफला

जो अषाढ़ से क्वांर तक, त्रिफला चूर्ण बनाय।
सेंधा नमक मिलाय के खावे शक्ति बढ़ाय।।

 

ऋतु के अनुसार हर्र सेवन विधि

मधु संग खाय बसन्त में गुड़ सों ग्रीष्म खाय।
वर्षा सेंधे नमक सों शक्कर शरद मिलाय।।
सोंठ संग हेमन्त में पीपर शिखिर पिसाय।
स्वास्थ्य हेतु यहि विधि सदा हर्र सवै ऋतु खाय।।

 

पेट दर्द के लिए

दो माशा काला नमक, दूनी सोंठ मिलाय।
हर्र चौगनी डाल के, लीजे चूर्ण बनाय।।
पानी में खौलाइये, छाने वस्त्र धुलाय।
तीन वार के पियत ही, पेट दर्द मिट जाय।।

 

शहद के गुण

चूना शहद मिलाइये दोनों एक समान।
बिच्छू काटे पर धरे, मिटे कष्ट महान।।
शयन समय नित डालिये, शुद्ध शहद निज नैन।
रोग रतौंधी दूर हो अरु पावे नर चैन।
केशर शहद मिलाय के, नेत्रन मांहि लगाय।
लालामी गर्मी मिटे रोग रतौंधी जाय।।
शुद्ध शहद में दीजिये सेंधा नमक मिलाय।
कछुक दिवस उपरांत ही फूली देय मिटाय।।
प्रातः कलोजी लीजिये, दो माशे पिसवाय।
शहद संग चटवाइये, तुरत चौथिया लाभ।।