रंगमंच समिति

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बुन्देलखंड की प्राचीनतम संज्ञा “चेदि” मिलती है। महाजनपद युग में चेदि की गणना सोलह बड़े राज्यों में की जाती थी। उन बड़े राज्यों का विस्तार उत्तर-पश्‍चिम में कम्बुज-गंधार से लेकर पूर्व में मगध तक था। पौराणिक बौद्ध एवं जैन साहित्य से चेदि जनपद की महत्ता का ज्ञान होता है इसकी राजधानी का नाम केन नदी के प्राचीन नाम पर शुक्तिमती (पालिसोत्किवती) मिलता है। शुक्तिमती चेदि क्षेत्र की विशेष नदी थी जिसके तट पर प्रागैतिहासिक काल से लेकर सभ्यता का विकास हुआ, यहाँ की बोली, भाषा, साहित्य, कला और लोक-जीवन का निरन्तर विकास होकर इसका प्रभाव अधिक द‍ृढ़ तथा कल्याणप्रद हुआ और कालान्तर में वह अपने क्षेत्र के बाहर की संस्कृति पर भी अपनी छाप छोड़ता है (बुन्देली समाज और संस्कृति आधुनिक सन्दर्भ–प्रो. बलभद्र तिवारी 1996, प्रकाशन–सुप्रिया पब्लिकेशन्स सागर), पुराणकालीन सन्दर्भों के आधार पर “दशार्ण” भी बुन्देलखंड के निमित्त प्रयुक्त हुआ है। मार्कण्डेय पुराण में अनेक जनपदों की चर्चा में दशार्ण का विवरण मिलता है दशार्ण और चेदि को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ माना जाता है। दस नदियों वाला प्रदेश दशार्ण है और दस दुर्गों वाले प्रदेश के भी दशार्ण नाम से अभिहित किया जाता है। बुन्देलखंड से सम्बन्धित दशार्ण को विन्ध्याचल पर्वत पर स्थित पश्‍चिम के दुर्गभूमि प्रदेश को ही मानते हैं। अत: दशार्ण की पौराणिक महत्ता विस्मृत नहीं की जा सकती है। (बुन्देली समाज और साहित्य प्राचीन एवं मध्यकालीन सन्दर्भ—प्रो. बलभद्र तिवारी 1995, प्रकाशन–बुन्देलीपीठ डॉ. हरिसिंह गौर वि.वि. सागर)

बुन्देलखंड का बुन्देली समाज और संस्कृति ही नहीं साहित्य भी प्राचीन काल से अब तक समस्त भारतीय समाज की तरह सामाजिक विकास की प्रारम्भिक विशेषताओं से अब तक मुक्त नहीं हो पाया है व्यक्तिगत जीवन को सामूहिक मानदंडों ने सदियों तक परिचालित किया है और समाज आज भी वर्ग-जाति या समुदायों में बँटा है इसलिए इन मानदंडों और जीवनादर्शों से सम्पृक्त बुन्देली साहित्य में इसका विशेष चित्रण मिलता है। (बुन्देली समाज और साहित्य प्राचीन एवं मध्यकालीन सन्दर्भ—प्रो. बलभद्र तिवारी 1995, प्रकाशन–बुन्देलीपीठ डॉ. हरिसिंह गौर वि.वि.सागर) बुन्देलखंड दशार्ण में दस नदियों के नाम इस प्रकार हैं–धसान, कालीसिन्ध, बेतवा, चम्बल, जमुना, नर्मदा, केन, टोंस और जामनी।

बुन्देलखंड में साहित्य, कला और संस्कृति की अनूठी प्रचुरता देखने मिलती है। जिनमें पाषाण कला की शिल्प, शैल चित्र, मिट्टी की कलाकृति के साथ ज्ञान, भक्ति और मनोरंजन हेतु लोकगीत, स्वाँग, लोकनृत्य, लोककाव्य, लोकलीला, लोककथा, लोकगाथा और नौटंकी लोकनाट्‍य की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है और लोक-साहित्य का बहुत महत्त्वपूर्ण अंग है। जन समाज में शिक्षा देने और मनोरंजन करने का इससे सरल, सहज और महत्त्वपूर्ण साधन दूसरा नहीं मिलता। लोक से जन समाज का बोध होता है। नाट्‍य पुरुषवाचक संस्कृत का शब्द है जो नाटक के लिए अभिनय, नृत्यकला, अभिनय कला, अभिनेता की वेशभूषा और अभिनेता अर्थ का द्योतक है। चूँकि लोकनाट्‍य की क्रियाओं को लोक धर्म प्रवृत्त होना चाहिए साथ ही लोक नाट्‍य के अन्तर्गत जो शास्त्र, जो शिल्प और जो क्रियायें जो लोकधर्म से अनुप्रमाणित हों उन्हें ही शामिल किया जाता है। लोकनाट्‍य का सम्बन्ध विशिष्‍ट शिक्षित समाज से भिन्‍न सर्वसाधारण के जीवन से होता है। जो परम्परा से अपने-अपने क्षेत्र में मनोरंजन का साधन होता है उसमें लोक प्रचलित परम्परागत रूढ़ियाँ, धार्मिक अनुष्‍ठान, कथा, आख्यान और वार्ता विश्‍वासों का लेखा-जोखा होता है। यह कला भी बुन्देलखंड में तीन प्रकार से फलीभूत है–प्रहसन, लीला एवं नृत्य। प्रहसन में बच्चों के खेल-खेल में प्रहसन, महिलाओं के तीज-त्यौहार या शादी-विवाह के दौरान प्रहसन और पुरुषों के नृत्य या गायन के दौरान प्रहसन स्वाँग शामिल है, लीला में रामलीला, रासलीला, ऐतिहासिक चरित्रों, क्षेत्र नायकों के जीवन पर आधारित नृत्यलीला, नौटंकी शामिल है। (बुन्देली लोक काव्य भाग-1 – प्रो. बलभद्र तिवारी) भरतमुनि ने लोक चित्त को नाटक की वास्तविक प्रेरणाभूमि और कसौटी माना है और उनके मतानुसार नाटक और लोक नाट्‍य दोनों को लोक सिद्ध होना अति आवश्यक है। इसीलिए लोकनाट्‍यों में नृत्य नाटक भी शामिल होते हैं जिनमें संगीतबद्ध नृत्य अभिनय एवं नाच गाना मिलाकर तीज-त्यौहार, उत्सव, समारोह में अवसर विशेष पर पुरातन काल से बुन्देलखंड में जन सामान्य के हृदय में रच-बस गये हैं। जैसे–बरेदी, मोंनिया, काँगड़ा, ढिमरयाई जो जाति विशेष द्वारा ही किया जाता है। इसके साथ सैरा, नौरता, राई, बधाई और फाग का अलग ही आनन्द बुन्देलखंड अंचल में सहज, सरल देखने को मिलता है। लोक नाट्‍यों में भाषा सरल होती है, संवाद छोटे होते हैं। पुरुष पात्रों के साथ नारी पात्र भी भाग लेते हैं। इनमें रंगमंच खुला होता है। कहीं-कहीं पर भाषा में अश्लीलता आ जाती है। बुन्देलखंड में रामलीला को मंचित करने के बहुत ही प्राचीन प्रसंग सहज इतिहास में सुलभ हैं। बुन्देलखंड के तात्कालिक जिला झाँसी उत्तर प्रदेश में बाँदा जनपद (वर्तमान में जिला और सम्भाग है) के गाँव मटौंध के सर्वश्री पं. रामकुमार, रामसहाय, मोहन लाल त्रिपाठी की रामलीला कम्पनी जो धर्म विजय के नाम से पूरे उत्तर प्रदेश और मध्यभारत में प्रसिद्ध थी स्वतन्त्रता-प्राप्ति के पूर्व राजा महाराजाओं ने इसे बहुत प्रश्रय देकर काफी लम्बे अर्से तक जीवित रखा था। इसमें लगभग 250 सदस्य थे इसकी प्रस्तुति में गाँव के गाँव उमड़ पड़ते थे। राजा अवध के दरबार द्वारा हर साल इसकी प्रस्तुति कराई जाती थी। यह एक-एक माह तक रोज रात्रि-भर की जाती थी बदले में राजा बड़ी भव्यता से इनकी विदाई सोना-चाँदी, कलदार, आभूषण देकर किया करते थे। रामलीला में प्रसंग से हटकर कोई एक अभिनेता विदूषक का पाठ अभिनीत करके बीच-बीच में दर्शकों को हँसी से लोट-पोट कर जाता था। रामलीला में नाटकों जैसी वेशभूषा, रंगसज्जा, मंच-सज्जा, मुखौटों का भरपूर उपयोग होने से रामलीला बहुत रोचक बन जाती थी।

बुन्देलखंड में पुरातन काल से ही गम्मद चौपालों में बैठकें, ढोलक, नगड़िया, मृदंग, हारमोनियम, तारे, झूला, लोटा, ढपली, रमतूला, बाँसुरी, अलगोजा, एकतारा और सारंगी बजा के भक्ति व मनोरंजन किया जाता था। यहाँ भरतमुनि के नाट्‍य शास्त्र के अध्यायों पर आधारित रंगकर्म तो नहीं होता था किन्तु लोक नाट्‍य के रूप में शादी-विवाह के दौरान बारात जाने के बाद लड़केवालों के यहाँ महिलाएँ बाबा बनकर विभिन्‍न स्वाँग रचकर हँसी-ठिठौली करती थीं और उत्सव-समारोहों में लोकनृत्य राई जो पूरी रात्रि-भर होता था इसमें रोशनी हेतु मशाल जलाई जाती थी इसे तेल देने और व्यवस्थित करने और प्रमुख रूप नचनारी को थोड़ा विश्राम देने के स्वाँग खेला जाता था जो हास्य से परिपूर्ण होकर कोई सन्देश भी दे जाता था इसमें स्वाँग रच रहा पुरुष तरह-तरह के चरित्रों की नकल करके अभिनय करता था। बुन्देलखंड में चूँकि ग्वालियर का क्षेत्र हाथरस, अलीगढ़, आगरा से लगा हुआ होने और उरई, हमीरपुर, कानपुर से लगा हुआ होने से लखनऊ की नौटंकी भी चलन में आ गयी। इसी प्रकार बुन्देलखंड का दतिया डबरा या चम्बल का क्षेत्र राजस्थान से लगा होने से कठपुतली का खेल और पर्दा लगाकर नौटंकी का मंचन किया जाने लगा। इसमें लाला हरदौल, राजा हरिश्‍चन्द्र, ढोला मारू, मकरद्ध्वज, महाभारत के प्रसंग या फिर रामलीला का मंचन बहुत रोचकता से किया जाता था। बुन्देलखंड के सागर में सागर विश्‍वविद्यालय की स्थापना के पूर्व लोकनाथ सिलाकारी ने दीवान हरदौल जू लिखा जो सागर में मंचित भी हुआ। आजादी के बाद 50वें दशक में औरंगजेब की आखिरी रात जो रामकुमार वर्मा ने हिन्दी में लिखा था जिसे मंचित रंगमंडली ने किया, इसमें सागर के रंगकर्मी डॉ. लक्ष्मीनारायण सिलाकारी, सेनबन्धु और सराफ थे। दूसरा नाटक इसी दशक में राजा दुबे, रामकली मिश्रा, जानकी रमण मन्दिर राधा टॉकिज से लगे हुए हॉल में मंचन किया गया। तीसरा नाटक प्रभात भट्टाचार्य जो आजकल उज्जैन में मालवीय नाट्‍यकर्म में बहुत बड़े रंगकर्मी के रूप में सतत् रंगकर्म में कार्य कर रहे हैं। श्री प्रभात भट्टाचार्य नाटक का मंचन गोपालगंज कालीबाड़ी मन्दिर में नाटक करते थे। उन्होंने ही सागर विश्‍वविद्यालय के नाट्‍य दल को यूथ फेस्टिवल में पहली बार नाटक का निर्देशन करके शामिल कराया था और विजेता बन उनका नाटक प्रथम स्थान पर आया था। प्रभात भट्टाचार्य के निर्देशन में मनोहर वर्मा, डॉ. कान्तिकुमार जैन भी रंगकर्म में सक्रिय रहे। माधव मनोज शुक्ल ने लाला हरदौल नाटक लिखा। साठवें दशक में प्रयोग संस्था बनी, उसे श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान के लड़के डॉ. विजय चौहान, जितेन्द्र कुमार शर्मा जो प्राचार्य सेंट्रल स्कूल बने। सत्येन्द्र कुमार (जो भोपाल में कहानीकार बन गये थे) इन्होंने यूथ फेस्टिवल के लिए चैखव की कहानी पर नाटक तैयार करके मंचित किया था। इन लोगों ने अन्धा युग, फरार फौज नाटक का मंचन किया। फरार फौज में मंच पर भव्य रंग-सज्जा के साथ ही जीप को चलाकर मंच पर लाया गया था जो अपने-आप में दर्शकों के लिए उत्सुकता बन गयी थी। इस नाटक में डॉ. बलभद्र तिवारी, डॉ. विवेक दत्त झा, डॉ. मल्लिकार्जुन, हंसराज नामदेव, रमेशदत्त दुबे का मंच एवं मंच पाश्र्व पर सहयोग रहा था। वनमाला भवालकर ने मराठी में नाटक लिखे। मराठी समाज ने इनका मंचन किया। सत्तरवें दशक में बंसी कोल ने सागर आकर अग्‍नि लोक नाटक तैयार कराया और रमेश दत्त दुबे ने बुन्देली में इस नाटक के गीत लिखे, इसका प्रदर्शन सागर और भोपाल में किया गया। सन् 1969 में सागर विश्‍वविद्यालय में अपने हिन्दी विभाग प्रथम विभागाध्यक्ष नन्ददुलारे वाजपेयी की मंशा को अमलीजामा तत्कालीन विभागाध्यक्ष भगीरथ मिश्रा ने बुन्देली पीठ की स्थापना की और इसका प्रभारी डॉ. बलभद्र तिवारी को बनाया गया। इन्होंने बुन्देली में आल्हा-ऊदल जैसे बुन्देला नायकों का नाटक महोबिया लिखा इसका मंचन छठवें विश्‍व पुस्तक मेला 1984 में दिल्ली प्रगति मैदान पर श्याम मनोहर मिश्रा के निर्देशन में किया गया। अस्सी के दशक में श्याम मनोहर मिश्रा ने रंगमंच परिषद का गठन किया, इसमें डॉ. श्याम मनोहर मिश्रा, डॉ. अनिल शर्मा, ओमप्रकाश भारद्वाज, कुमारी हेमलता मिश्रा, गुड्डू त्रिवेदी, डॉ. अनिल जैन, रबीन्द्र दुबे कक्‍का, अरविन्द जैन, श्रीमती सुजाता मलैया, दिलीप मलैया, श्रीमती गायत्री निगम ने दुलारीबाई, रसगन्धर्व, जुलूस और गुरु-चेला जैसे सफल नाटकों का मंचन किया। भारतभवन की तरफ से सागर स्टेडियम में ब.व. कारन्त, हबीब तनवीर, अलखचन्दन जैसे प्रसिद्ध रंगकर्मी निर्देशकों ने घासी राम कोतवाल, अंडे के छिलके, चरणदास चोर जैसी भव्य प्रस्ततियाँ हुईं।

नब्बे के दशक में सागर विश्‍वविद्यालय में द‍ृश्य विभाग के डिप्लोमा हेतु रंगकर्मी दिनेश खन्‍ना ने एक कार्यशाला आयोजित की। चूँकि गोविन्द नामदेव NSD में प्रवेश लेकर रंगमंच विधा में महारथ पाकर NSD की रैपेटरी में बतौर अभिनेता कार्यरत थे और सागर के लोगों को जब भी सागर आते उन्हें रंगमंच की बारीकियों से अवगत कराते रहे। इसी से प्रेरणा लेकर मुकेश तिवारी, आशुतोष राना, महेन्द्र मेवाती, श्रीवर्द्धन त्रिवेदी भी NSD में प्रवेश लेकर रंगमंच में महारथ हासिल करने में सफलता पा गये। मुकेश तिवारी ने NSD से passout होने के तुरन्त बाद जो एक वर्ष किसी संस्था से संलग्‍न होकर नाटकों का मंचन कराना अनिवार्य है उससे पहले ही छुट्टी पर अपने गृहनगर सागर आकर कोर्ट मार्शल का मंचन कराया था और तभी सन् 1992 में अन्वेषण थियेटर ग्रुप की नींव पड़ी । मुकेश ने अन्तिम वर्ष के बाद मुख्यमन्त्री का मंचन कराया था। अन्वेषण थियेटर गु्रप को समय-समय पर गोविन्द नामदेव का आशीष प्राप्त होते रहने से पंकज तिवारी, आनन्द जैन, जगदीश शर्मा, राकेश सोनी, रवीन्द्र दुबे कक्‍का के निर्देशन में नाट्‍य प्रस्तुति करके यह दिन दूना रात चौगना रंगकर्म में सतत संलग्‍न रहकर आज तक अपने-आपको शौकिया रंगमंच की विषम परिस्थितियों में भी जीवित करने में सफल रहा है। अन्वेषण थियेटर ग्रुप ‘अथग’ के तत्त्वाधान में ब.व. कारन्त, हबीब तनवीर, सुनील सिन्हा, आलोक चटर्जी, इश्तियाक खान की प्रस्तुति कार्यशाला आयोजित कर पूरे बुन्देलखंड में रंगकर्म की अलख जगाने का श्रेय दिलाया। यहाँ अथग ने बंसीकोल के ग्रुप विदूषक का नाट्‍योत्सव, कबीर महोत्सव में अनेकों नाट्‍य प्रस्तुति कराके बुन्देलखंड में रंगकर्म की धारा प्रवाहित कराने में प्रमुख योगदान दिया है। रंगकर्मी राजेन्द्र दुबे एवं गणेश चौरसिया इन्होंने और लोगों के साथ विट्ठल आला रे आला का मंचन किया। इस सदी के प्रारम्भ में दमोह के राजीव आयाची और पन्‍ना में इश्तियाक खान ने भी रंगकर्म को गति प्रदान करने में योगदान दिया। इन लोगों के प्रयास से यहाँ NSD ने कार्यशालायें आयोजित कीं। इसी दौर में सागर में थर्ड बेल, सरस, रंग प्रयोग, रंगखोज नाट्‍यपरिषद, युवा थियेटर तरुण सांस्कृतिक आर्ट्स दर्पण जैसे रंगकर्मी के समूहों ने भी यदा-कदा नाटकों का मंचन करके रंगधारा को और प्रबल करने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

रवीन्द्र दुबे ‘कक्‍का’ रंगमंच परिषद की रंगमंच गतिविधियाँ मृतप्रद होने पर ‘शंखनाद’ नुक्‍कड़ नाट्‍य एवं बुन्देली कला एवं सांस्कृतिक दल बनाकर सैकड़ों नुक्‍कड़ नाटक पूरे सागर जिले, छतरपुर जिले, दमोह जिले, टीकमगढ़ जिले में इन्दिरा गाँधी गरीबी हटाओ योजना, मध्यप्रदेश प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड, स्वच्छता अभियान, बिजली समाधान योजना, एड्स, पर्यावरण, कहानी राम और रोटी स्वतन्त्रता संग्राम की 150वीं वर्षगाँठ जैसे महत्त्वपूर्ण योजनाओं के प्रचार-प्रसार हेतु नुक्‍कड़ नाटकों का लेखन किया और प्रस्तुति करके रंगकर्मियों में रंगमंच के आकर्षण को बनाये रखने में कामयाब होकर व्यावसायिक रंगमंच की नींव रखने में भी पूर्णत: सफलता पायी। डॉ. सर हरिसिंह गौर विश्‍वविद्यालय संस्कृत विभाग में डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी ने संस्कृत नाटकों का मंचन कराया, संस्कृत नाटकों का लेखन किया और बाहर के ग्रुप से प्रस्तुतियाँ भी कराई और संस्कृत नाटकों के लिए कार्यशालायें आयोजित करायीं। कमल वशिष्‍ट जैसे वरिष्‍ठ रंगकर्मी सागर पधारे संस्कृत नाटक की प्रस्तुति की।

रंगमंच परिषद की गतिविधियाँ शिथिल पड़ने पर दिलीप मलैया ने इन्दौर से नाटक एक था गधा उर्फ अलादाद खाँ का मंचन अपने केंट स्थित बँगला में कराया था। अथग के तत्त्वाधान में NSD की प्रस्तुति कार्यशालायें आयोजित हो सकीं और खबसूरत बहू नाटक भारंगम NSD दिल्ली के मंच पर अभिनीत किया गया। सागर विश्‍वविद्यालय के रंगकर्मी प्रत्येक वर्ष युवा फेस्टिवल में प्रथम स्थान पाकर बुन्देलखंड में रंगकर्म के हस्ताक्षर बन गये हैं।

– रबीन्द्र दुबे (कक्‍का)

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डॉ वीरेन्द्र कुमार निर्झर जी 

आपने बुन्देली कहावतों का भाषा वैज्ञानिक एवं समाजशास्त्रीय अनुशीलन कर मध्यप्रदेश शासन उच्च शिक्षा विभाग के सेवासदन महाविद्यालय बुरहानपुर मप्र में विभागाध्यक्ष के रुप में पदस्थ रहे।

बुन्देली धरती के सपूत डॉ वीरेन्द्र कुमार निर्झर जी मूलतः महोबा के निवासी हैं। आपने बुन्देली कहावतों का भाषा वैज्ञानिक एवं समाजशास्त्रीय अनुशीलन कर मध्यप्रदेश शासन उच्च शिक्षा विभाग के सेवासदन महाविद्यालय बुरहानपुर मप्र में विभागाध्यक्ष के रुप में पदस्थ रहे। अखिल भारतीय साहित्य परिषद मालवा प्रांत, हिन्दी मंच,मध्यप्रदेश लेखक संघ जिला बुरहानपुर इकाई जैसी अनेक संस्थाओं के अध्यक्ष रहे। आपके नवगीत संग्रह -ओठों पर लगे पहले, सपने हाशियों पर,विप्लव के पल -काव्यसंग्रह, संघर्षों की धूप,ठमक रही चौपाल -दोहा संग्रह, वार्ता के वातायन वार्ता संकलन सहित अनेक पुस्तकों का सम्पादन कार्य किया है। आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से कहानी, कविता,रूपक, वार्ताएं प्रसारित हुई। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में शताधिक लेख प्रकाशित हैं। अनेक मंचों से, संस्थाओं से राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित एवं पुरस्कृत किया गया है। वर्तमान में डॉ जाकिर हुसैन ग्रुप आफ इंस्टीट्यूट बुरहानपुर में निदेशक के रूप में सेवायें दे रहे हैं।

डॉ. उषा मिश्र 

सेवा निवृत वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी केमिस्ट्री और टॉक्सिकोलॉजी गृह विभाग, मध्यप्रदेश शासन।

नाम – डा. उषा मिश्रा
पिता – डा.आर.सी अवस्थी
पति – स्व. अशोक मिश्रा
वर्तमान / स्थाई पता – 21, कैंट,
कैंट पोस्ट ऑफिस के सामने,
माल रोड, सागर, मध्य प्रदेश
मो.न. – 9827368244
ई मेल –
[email protected]
व्यवसाय – सेवा निवृत वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी ( केमिस्ट्री और टॉक्सिकोलॉजी ) गृह विभाग, मध्यप्रदेश शासन।
शैक्षणिक योग्यता – एम. एससी , पीएच. डी.
शासकीय सेवा में रहते हुए राष्ट्रीय – अंतराष्ट्रीय कान्फ्रेंस में शोध पत्र की प्रस्तुति , मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर, गृह विभाग द्वारा आयोजित वर्क शॉप, सेमिनार और गोष्ठीयों में सार्थक उपस्थिति , पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज सागर में आई. पी. एस., डी. एस. पी. एवं अन्य प्रशिक्षणु को विषय सम्बन्धी व्याख्यान दिए।

सेवा निवृति उपरांत कविता एवं लेखन कार्य में उन्मुख, जो कई पत्रिकाओं में प्रकाशित।
भारतीय शिक्षा मंडल महाकौशल प्रान्त से जुड़कर यथा संभव सामजिक चेतना जागरण कार्य हेतु प्रयास रत।