
प्रो. रामजी उपाध्याय
May 11, 2026डॉ. वनमाला भवालकर
इनका जन्म कर्नाटक के बेलगाँव नामक नगर में 08.02.1914 को हुआ। इनके पिता श्री नारायण राव लोकूर बम्बई हाईकोर्ट के न्यायाधीश होने के साथ ही संस्कृत के अच्छे पंडित थे। इनकी माता श्रीमती लक्ष्मी बाई लोकूर उत्तम गृहिणी थीं। इनकी मातृभाषा कन्नड़ थी, लेकिन महाराष्ट्रीय ब्राह्मण होने के नाते इनकी शिक्षा मराठी माध्यम से हुई। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा कर्नाटक में ही सम्पन्न हुई। 14 वर्ष की आयु में इन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। मुम्बई वि.वि. से स्नातक तथ कलकत्ता वि.वि. से 1937 में प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति में एम.ए. प्रथम श्रेणी में सर्वप्रथम स्थान के साथ उत्तीर्ण की। नागपुर वि.वि. 1952 में संस्कृत में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। प्रारम्भ में एक वर्ष तक गोखले मेमोरियल कॉलेज कलकत्ता में अध्यापन करने के पश्चात् 1945-46 में पूना के एस.पी. कॉलेज में अध्यापन किया तथा 1946 में सागर वि.वि. के स्थापना वर्ष में मानद व्याख्याता के रूप में नियुक्त होने वाली प्रथम महिला शिक्षक थीं। 1947 से 1953 तक अस्थायी व्याख्याता के रूप में कार्य किया। 1953 से 1976 तक स्थायी व्याख्याता तथा प्रवाचक रहीं। 1976 में ये सेवानिवृत हो गयीं। सेवा निवृत्ति के पश्चात् इनकी सेवा अवधि दो वर्ष तक बढ़ा दी गयी थी।
1935 में इनका विवाह प्रो. डी. आर. भवालकर के साथ सम्पन्न हुआ। इनके पति सागर वि.वि. में भौतिकशास्त्र विभाग के अध्यक्ष रहे। इनकी तीन पुत्रियां डॉ. मीना पिम्पलापुरे (वरिष्ठ समाज सेविका, सागर), श्रीमती लेखा, श्रीमती अरुणा नावलीकर और दो पुत्र श्री दिलीप भवालकर (केट के निदेशक) और श्री प्रदीप भवालकर हैं। 1948 से 1970 तक सागर वि.वि. के महिला छात्रावास की महिला वार्डन भी रहीं तथा सागर नगर और विश्वविद्यालय में अनेक सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का कुशल संचालन किया। वे छात्र छात्राओं व कनिष्ठ सहायोगियों के बीच “काकू” के पारिवारिक सम्बोधन से पुकारी जाती थीं। हिन्दी में इनका ‘उधार का पति’ नाटक अत्यन्त लोकप्रिय हुआ और अनेक स्थानों पर खेला गया। इनकी नृत्य नाटिका ‘पार्वतीपरमेश्वरीयम्’ की प्रस्तुति सागर, भोपाल, इन्दौर और कालिदास समारोह उज्जैन में अनेकों बार हुई। इनके रामवनगमनम्, शाकुन्तलसंगीतिका, दीपदानम्, पाददण्डम् आदि नाट्यकृतियों की भी अनेक प्रस्तुतियां हुईं। 1961 में सागर वि.वि. से प्रो. रामजी उपाध्याय के निर्देशन में ‘महाभारत में नारी’ विषय पर पीएच.डी. उपाधि प्राप्त की। इनकी एक अन्य शोधकृति ‘पञ्च महाकाव्येषु चन्द्र:’ भी है। उनका संस्कृत के अलावा हिन्दी, मराठी, कन्नड़, जर्मन तथा अंग्रेजी भाषा पर अच्छा अधिकार था। इनका विपुल साहित्य अपनी सम्पन्नता में अतुलनीय है। इन्हें म.प्र. तथा उ.प्र. शासन द्वारा कई पुरस्कार प्राप्त हुए तथा ‘संसारीचा सरीपाट’ नामक नाट्यकृति पर मध्यप्रान्त शासन द्वारा पुरस्कार तथा श्रेष्ठ महिला लेखिका हेतु तिरुमलाम्बापुरस्कार 1993 में प्राप्त हुआ। सारनाथ स्थित तिब्बतीय संस्थान में शिक्षक प्रो. कामेश्वरनाथ मिश्र इनके शिष्य रहे हैं।
सागर वि.वि. से सेवानिवृत्ति के पश्चात् इन्होंने अपने निजी संस्कृत ग्रन्थ सदुपयोग हेतु अपने शिष्य प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी को दे दिये। 1967 से 1972 तक केन्द्रीय विद्यालय सागर की चयन समिति की ये सदस्या रहीं। स्वच्छता, बागवानी, ज्योतिष, योग और संगीत में इनकी विशेष रुचि रही। जीवन के नवें दशक में इन्हें स्तन कैंसर और रक्तचाप जैसे रोगों ने घेर लिया। इन्दौर में अपने पुत्र के पास रहते हुए 30.07.2003 को ये दिव्य ज्योति में विलीन हो गयीं। इनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर डॉ. देवेन्द्र तिवारी ने सागर वि.वि. से डॉ. कुसुम भूरिया के निर्देशन में शोधकार्य किया है।
सम्पर्क – डॉ. मीना पिम्पलापुरे, वरिष्ठ समाज सेविका, सिविल लाईन, सागर (म.प्र.)





