
प्रो. बाबूराम सक्सैना
May 11, 2026
डॉ. वनमाला भवालकर
May 15, 2026प्रो. रामजी उपाध्याय
आचार्य रामजी उपाध्याय का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के मलैजी नामक गाँव में 01.07.1920 को हुआ। इनके पिता पं. महावीर उपाध्याय जी सुसंस्कृत, संस्कृतानुरागी एवं धर्मपरायण शिक्षक थे। इनकी माता श्रीमती यशोमती उपाध्याय धर्मपरायण एवं धर्मनिष्ठ महिला थीं। आचार्य रामजी उपाध्याय के तीन भाई तथा दो बहिनें थीं। सबसे बड़े श्री रमापति उपाध्याय आचार्य तक शिक्षा प्राप्त कर अपने क्षेत्र के प्रसिद्ध कर्मकाण्डी पण्डित थे। मझले भाई श्री नारायण उपाध्याय एस.डी.आई. थे। तीसरे भाई श्री देवनाथ उपाध्याय स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे तथा डी.एच. वी. कॉलेज में प्राचार्य थे। सबसे छोटे स्वयं डॉ. उपाध्याय थे। इन्होंने बलिया से ही हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण कर वाराणसी के क्वींस कॉलेज से इण्टर तथा इलाहाबाद वि.वि. से बी.ए., एम.ए. और डी.फिल. की उपाधि प्राप्त की। इनका शोधप्रबन्ध ‘संस्कृत एण्ड प्राकृत महाकाव्याज़’ अंग्रेजी भाषा में था। इनके निर्देशक प्रो. बाबूराम सक्सैना थे। 1962 में इन्होंने भारत की सांस्कृतिक भूमिका विषय पर शोधप्रबन्ध प्रस्तुत कर डी. लिट् की उपाधि प्राप्त की। संस्कृत में डी.लिट् उपाधि प्राप्त करने वाले ये सम्पूर्ण भारतवर्ष के प्रथम मनीषी हैं। काशी हिन्दू वि.वि. से 1983 में इन्हें डी.लिट्. की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया।
इनका विवाह बलिया जनपद में स्थित उरैनी नामक गांव में पं. इन्द्रदेव तिवारी की पुत्री विभा से सम्पन्न हुआ। विवाह के पश्चात् इनका नाम विभा से लक्ष्मी हो गया। डॉ. उपाध्याय के श्वसुर भी लखनऊ वि.वि. के रजिस्ट्रार थे। डॉ. उपाध्याय की तीन संतान हैं। बड़े पुत्र श्री श्रियंकर उपाध्याय रजाखेड़ी, सागर में निवासरत हैं। छोटे पुत्र डॉ. प्रियंकर उपाध्याय बी.एच.यू. वाराणसी से सेवानिवृत होकर वहीं निवासरत हैं। पुत्री डॉ. वनश्री उपाध्याय बी.एच.यू. से ही अंग्रेजी की सेवानिवृत प्रोफेसर हैं। डॉ. उपाध्याय के आदर्श गुरु डॉ. रामदहिन सिंह, पं. लक्ष्मण शास्त्री तैलंग, प्रो. बाबूराम सक्सैना तथ डॉ. उमेश मिश्र थे। डॉ. महादेव प्रसाद शर्मा पूर्व कुलपति, सागर वि.वि., प्रो. चन्द्रशेखर अवस्थी, अध्यक्ष, दर्शन विभाग, डॉ. बच्चूलाल अवस्थी, प्रो. हीरालाल गुप्ता इनके प्रतिदिन मिलने वाले मित्र थे। आचार्य रामजी उपाध्याय हमेशा सफेद खादी कुर्ता, धोती तथा टोपी धारण करते थे। सुदीर्घ स्वर, तेजस्वी व्यक्तित्व, विनोदप्रिय तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे। 07.07.1947 को सागर वि.वि. में व्याख्याता के पद पर नियुक्त हुए। 11.07.1957 को प्रवाचक और सितम्बर 1963 में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुए। ये 1957 से 1980 में सेवानिवृति तक विभागाध्यक्ष रहे।
संस्कृत और संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए इन्होंने अनेक संस्थाओं की स्थापना की। इनकी लगभग 65 पुस्तकें तथा 100 शोधालेख प्रकाशित हुए हैं। इनके निर्देशन में 40 शोधार्थियोंने पीएच.डी. उपाधि प्राप्त की है। इनके प्रिय शिष्यों में डॉ. हरीन्द्रभूषण जैन, डॉ. वीरेन्द्रकुमार जैन, प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, प्रो. कुसुम भूरिया, डॉ. इन्द्रमोहन सिंह तथा डॉ. रामरतन पाण्डेय रहे। ये हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत तथा प्राकृत भाषा के अच्छे ज्ञाता थे। अनेक वर्षों तक सागरिका नामक शोधपत्रिका का सफल संचालन किया तथा प्रधान संपादक रहे। 1980 में सेवानिवृत होकर वाराणसी चले गये जहां महामनापुरी में निवास करते थे। वाराणसी में भी प्रतिदिन सायंकाल भ्रमण, गौसेवा, प्रातः 3 बजे उठकर चार घण्टे अध्ययन करना इनकी दिनचर्या का नियम था। जीवन के अंतिम समय तक विश्वनाथ भगवान् का दर्शन तथा लेखन कार्य अनवरत रूप से करते रहे। मृत्यु के कुछ समय पूर्व ये चर्मरोग से पीड़ित हो गये। दिनांक 17.01.2011 को इस महामनीषी ने अंतिम सांस ली। मृत्यु के समय इनकी पत्नी तथा ज्येष्ठ पुत्र इनके साथ थे। कुछ समय बाद इनकी पत्नी का भी निधन हो गया।
सम्पर्क – (1) श्री श्रियंकर उपाध्याय, रजाखेड़ी, सागर (म.प्र.) मो. – 9893835002,
(2) प्रो. प्रियंकर उपाध्याय, वाराणसी मो. – 05422575899,
(3) प्रो. वनश्री उपाध्याय, वाराणसी मो. – 05422368077





