ज्योतिषाचार्य पं. जे.पी. पाण्डेय,
नाखरे गली, गोपालगंज सागर, बुन्देलखण्ड, मो.9302920314
ज्योतिषाचार्य महामना पं. महेश पाण्डेय,
नेहानगर, अभ्युदय स्कूल के सामने, मकरोनिया, सागर, बुन्देलखण्ड, मो.9826331949

भारत में सबसे प्राचीन वेद ज्ञान का भंडार ऋग्वेद में ज्योषित के 44 श्लोक, यजुर्ववेद में 45 श्लोक एवं अथर्ववेद करीब 164 श्लोक जिनमें संस्कृत के श्लोकों के द्वारा मनुष्यों का भविष्य या फलित संबंधी जानकारी न होकर ब्रह्माण्ड और समय, ग्रह, नक्षत्रों और भूमण्डलीय ज्ञान वर्णित है। भारत में ज्योतिषशास्त्र के जनक महर्षि पाराशर जी जो ऋषि विश्वामित्र के शिष्य थे, उनके द्वारा प्रकाशित ग्रन्थ ‘वृहत पाराशर (होराशास्त्र) से ज्योतिष की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। ऐसी जानकारी प्राप्त होती है कि महर्षि भृगु ने गणेश जी की सहायता से 5 लाख कुण्डलिया बनाकर फलित प्रकाशित किया।

ज्योतिष का इतिहास अर्वाचीन काल से स्थापित रहा है। वेदों में खासकर ऋग्वेद में यत्र, तत्र, सर्वत्र पाये गये हैं। भारत में सबसे प्राचीन वेद ज्ञान का भंडार रहा है। ऋग्वेद में ज्योतिष के 44 श्लोक, अथर्ववेद 164 श्लोक, यजुर्वेद में 45 श्लोक संस्कृत में पाये गये हैं जो कि मनुष्य का भविष्य या फलित संबंधी जानकारी न होकर ब्रह्माण्ड और समय, नक्षत्रों और भूमण्डलीय ज्ञान वर्णित है। भारत में ज्योतिष शास्त्र के जनक महर्षि पाराशर जो ऋषि विश्वामित्र के शिष्य थे उनके द्वारा रचित ग्रन्थ ‘वृहत पाराशर होराशास्त्र’ में ज्योतिष की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। यह भी मान्यता है कि संसार में सबसे पहले भृगु ऋषि ने गणेश जी की सहायता से 5 लाख कुण्डलियां बनाकर फलित प्रकाशित किया।

ज्योतिषः वेदाणां चक्षुः। अर्थात् ज्योतिष वेदों का नेत्र है। नेत्र देखने वाला और दिखा सकने वाला है अतः वह वेदांग जो देख सकता है और दिखा सकता है।

नौ ग्रहों एवं 12 राशियों व अन्य गणक पर सांख्यिकीय अनुसार यह निर्मित रहा है। मानव जाति के कल्याण हेतु इसकी गणना की गई है। परमपूज्य ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना के साथ नारद को भी ज्योतिष ज्ञान दिये जाने के समान वेद पुराणों में अंश पाये गये हैं।

ज्योतिष का बुन्देलखण्ड की उत्पत्ति के पूर्व समय यह ज्ञान प्राप्त था। यह ज्ञान चिकित्सा के दौरान समाहित रखकर चिकित्सा की गई। सूर्य की उत्पत्ति के साथ ज्योतिष की उत्पत्ति भी मानी गयी है। चौबीस हाथ लम्बे बांस उपलब्ध होते थे, जिनकी लम्बाई अनुसार अनेकों बांसों के साथ गणना की जाती थी। चौबीस घंटे में एक दिन व एक रात होती थी तद्नुसार वर्ष का ज्ञान किया जाता था। सूर्य का उत्तरायण व दक्षिणायन 6-6 मास होता था। 12 घंटे दिन व रात में होते थे। बुन्देलखण्ड में नये वर्ष की कल्पना मकर संक्रांति (बुन्देलखण्ड में इसे सक्रांत) को कहा जाता है। इसे नवीन वर्ष की संज्ञा दी गई है।

रविवार व मंगलवार खरे दिन माने जाते हैं, खरा दिन- अशुभ। इसका मतलब यह कि यह दोषपूर्ण होते हैं। इस अवसर पर नये कार्य, शुभ कार्य नहीं किये जाते। इसी प्रकार प्रश्न पत्र को भी दोष माना गया है। आकाश में चन्द्रमा होने पर उसे शुक्ल पक्ष माना गया है। शुक्ल पक्ष में किये गये कार्य शुभ होते हैं। बुन्देलखण्ड में ज्योतिष का कृषि, स्वास्थ्य, चिकित्सा, देश के शासन इत्यादि के संचालन में अभूतपूर्व ज्ञान की स्थापना रही है जो कि सर्वदा देखने में भी आयी है।

कृषि- बोनी, बखरनी, उड़ावनी, फसल काटना, एकत्र करना एवं विपणन करना, यह कार्य ज्योतिष अनुसार ही संचालित होते आ रहे हैं।

स्वास्थ्य- मानव स्वास्थ्य के लिए अनेक रत्नों, उपरत्नों का धारण करना, यह क्रय न करने की स्थिति में वृक्ष पौधों के अंश धारण करना, विभूति का लगाया जाना, काजल के डिठोना इत्यादि का लगाया जाना, अनेकों का इस प्रकार प्रचलित हैं।

चिकित्सा- वैद्य अपनी चिकित्सा के साथ ज्योतिष का भी पर्याप्त ज्ञान रखते रहे हैं, वे स्वयं रोगी के रोग परीक्षण के दौरान उसके नाड़ी ज्ञान के साथ ज्योतिष ज्ञान, अरिष्ट के लक्षण एवं रोग की तीव्रता का अध्ययन सम्मिलित प्रयास से रखते रहे हैं साथ ही ईष्ट को मानकर ही औषधि निर्मित कर रोगी को दिये जाने की प्रथा रही है।

देश का शासन- बुन्देलखण्ड में अनेकों राजे, महाराजे हजारों वर्ष राज्य करते रहे हैं। इन राजाओं के राज्य में अपनी सेना को व राज्य को उचित संचालन हेतु राजगुरु, राज्यवैद्य, दो मुख्य सलाहकार, न्याय व राजस्व मंत्री, सूचना प्रसारण मंत्री, विदेशी मंत्री, रक्षा मंत्री इत्यादि अन्यान्य आवश्यकतानुसार रखे जाते थे। राजाओं के विभिन्न परामर्श में प्रायः राजगुरू से युद्ध, मंदिर स्थापना, पाणिग्रहण, देवालय स्थापना, भगवान प्रतिष्ठा, युद्ध इत्यादि के बारे में ज्ञान प्राप्त कर ही यह कार्य होते थे। यहाँ तक जन्म एवं मृत्यु का ज्ञान भी इन्हीं से प्राप्त होता था जो आज भी प्रतिष्ठापित है।

 

नवजात शिशु की उत्पत्ति के साथ ही उसकी कुण्डली बनायी जाती थी, जो कि आजीवन का संपूर्ण ज्ञान कुण्डली के माध्यम से परिवार को दिया जाता था। यह स्वयं गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखित रामचरितमानस में तत्कालीन राजस्व व न्याय मंत्री तोडरमल द्वारा अपनी पुस्तक में लिखा है, यह संपूर्ण लेख भोजपत्र पर गोस्वामी तुलसीदास जी ने वर्णित किया था। स्वयं राजा राम की पत्रिका को भी इन्हीं ऋषियों ने ही बनाई थी। राजा राम के गुरु आचार्य वशिष्ठ को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ था।

आदिकाल में अधिकांश राजा अपने राजपाट में व्यवस्थित संचालन हेतु राजगुरु को ही सम्मान देते थे। बुन्देलखण्ड के अनेकों राजाओं, राजवैद्यों, राजगुरुओं में व्यापक ज्ञान ज्योतिष का रहा है। युद्ध के दौरान राजे, महाराजे इन्हीं राजगुरुओं से सलाह लेकर तिथि समय निश्चित कर युद्ध करते व युद्ध विराम भी करते थे एवं कार्य सफल होते थे। कुछ राजाओं की गणना आलेखों में प्राप्त हुई- 1. महाराजा छत्रसाल (1649-1681 तक), 2. विदाधर चन्देल, 3. वीरभद्र कुन्तिका सोहनरानी, 4. रूद्र प्रताप बुन्देला, 5. महारानी लक्ष्मीबाई इत्यादि अनेकों राजे महाराजे बुन्देलखण्ड में शासनरत् रहे।

प्रायः दिन व रात की रचना एक आम ग्रामीण व शहरी इस प्रकार से करते रहे, जिस दिन शाम ढाई घंटे पहले होने लगे, उसका अगला दिन अमावस्या का है। चन्द्रमा दिन से आकाश में दिखने लगे तो यह भी अमावस्या माना जाता था। चन्द्रमा पूर्णतः से आकाश में सुबह तक दिखता रहे एवं अनेकों तारा का पुंज मंडल बनाकर अस्त होता है तो वह घड़ी सुबह का 5 बजाती है।

बुन्देलखण्ड में वैवाहिक गणना में ज्योतिष ज्यादा विस्तृत कार्य न करते हुए 4 तिथि में अक्षय तृतीया, देवउठनी एकादशी, धुरड़िया नवमीं, मृगशिला शुक्ल पंचमी (राजा राम के विवाह की तिथि) इन पर ही विवाह सुनिश्चित की जाती थी। अन्य तिथियां गौण रहती थी।

ऐतिहासिक दृष्टि से ऋग्वेद के काल में ज्योतिष की उत्पत्ति मानी गयी है। यद्यपि इस कालखण्ड में ज्योतिष का कोई स्वतंत्र ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता है। परन्तु ज्योतिष शास्त्र के अनेक विषय वेदों के मंत्र भाग एवं संहिता भाग में से पाये गये हैं। पूर्व काल में देशांतर लंका या उज्जैयिनी से लिया जाता है। 28 नक्षत्रों का ज्ञान भी था। बहुत से विद्वानों का मत यह है कि राशियों और दिनों का नाम यवन (यूनानियों) के सम्पर्क के पीछे के हैं। अनेक पारिभाषिक शब्द भी यूनानियों से लिये गये हैं- होरा, दृक्काण केन्द्र इत्यादि। ज्योतिष विद्या का यज्ञों की तिथि आदि सुनिश्चित करने में इस विद्या का प्रायोजन पड़ता था।

अतः ज्योतिष को अर्वाचीन काल से बुन्देलखण्ड में सम्मान प्राप्त था। यह आज भी सर्वत्र पाया जाता है। मन्दिरों में, गुरु स्थानों में, आश्रमों में, यज्ञों में, 16 संस्कारों को किये जाने में इनका भरपूर प्रयोग किया जाता है।

 

ज्योतिष का रोगों के उपचार में महत्व संबंधित उदाहरण

आयुर्वेद अपने प्रारंभिक काल से सर्वांगीण मानव सभ्यता के हित में विभिन्न विधाओं से युक्त शास्त्र रहा है। अनेकों रत्नों के शोधोपरान्त इस शास्त्र की रचना मानव हित में प्रस्तुत की गई है व मानव से इसे सर्वांगीण आत्मसात भी उसी प्रकार किया एवं अद्यतन भी उसे इस पर विश्वास भी है।

ज्योतिष आयुर्वेद के अष्टांग विधाओ में से एक विधा भूत, प्रेत, बाधा के साथ समाहित है।

ज्योतिष में प्रायः सभी रोगों की व्यवस्थाएं हैं। विभिन्न रत्न, उपरत्न व अन्यान्य रोग अनुसार व्यवस्थायें है। कुछ उदाहरण निम्नांकित हैं-

सिराशूल – यह तंत्रिका तंत्र का दर्द होता है इसमें मस्तिष्क में कोई विकार होता है अन्यथा कफ, नेत्र नासिका में, कर्ण की नलियों में कोई दोष होने से यह दर्द होना सामान्य कारण है, ज्योतिष में इस हेतु माणिक्य, नीलम, पन्ना इत्यादि रत्न के प्रयोग बताये गये हैं।

जोड़ो में दर्द – इनमें प्रायः वात, गांठों में दर्द होने पर यह रोग के सूर्य से उत्पन्न होना बताया गया है। अतः ज्योतिष में प्रातः सूर्य को जल देना, शनि मंत्र का 108 जप करना, नीलम मूंगा धारण करना, यह रोग से निवारण प्राप्त होता है।

शनि की दशा – यह भी एक विकार है। सरसों के तेल का शरीर पर लाभ होता है। सूर्य का पूजन, शनि मंत्र का 108 बार उच्चारण करना, सूर्य की लालिमा के सामने बैठना लाभकर होता है।

तांबे का कड़ा धारण करना – यह मानसिक रोगों दाहिने में हाथ में धारण करना लाभदायक होता है। इनकी प्रायः चन्द्रमा की स्थिति खराब होती है अतः पन्ना धारण किया जाता है।

हनुमान जी की उपासना से भी लाभ होता है। तांबे के बर्तन में जल रखकर नारंगी रंग का कपड़ा लपेट कर हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना करे, उसके साथ हनुमान वाहुक का पाठ करें। पूजन उपरांत तांबे के पात्र में रखा जल अपने शरीर पर लेप करें। इससे अनेकों रोगों में लाभ मिलता है।

बुन्देलखण्ड में इस तरह के ज्योतिष के उपाय प्रायः घरों में अपनी पीड़ा शान्ति के लिए बड़ी तन्मयता से ग्रहण किये जाते हैं।

 

पौधों का ग्रहों पर प्रभाव :-

ग्रहग्रहों का पौधों पर प्रभावग्रहों की स्थति का उपचार
सूर्यमदार दरवाजे के पास लगावेंमदार में जल दें व सूर्य मंत्र वाचन करें।
चंद्रचंदन या वेल घर के पीछे लगावेंबेल चंदन के नीचे बैठें चंद्र मंत्र वाचन करें।
मंगलआंबला घर के बीच में लगावेंआंबला के नीचे या आसपास बैठकर मंगल मंत्र वाचन करें।
बुधदूर्वा गमलें में घर के पीछे लगावेंदूर्वा की छटाई कर गणपति को स्नान करावे एवं मत्र वाचन करें।
वृहस्पतिकेले का पौधा भी घर के पीछे लगावेंकेले के वृक्ष में जल दें व मंत्र वाचन वृहस्पति हेतु करें।
शुक्रहर सिंगार का पौधा घर के पीछे लगावेंहर सिंगार वृक्ष के नीचे खुसबूदार फूल साफ कर लें एवं अपने विस्तर के तकिये के नीचे रख ले शुक्र मंत्र का वाचन करे।
शनिशमी घर द्वार के सामने लगावेंशमी वृक्ष सरसों का तेल दिया जलाकर मंत्रोंच्चारण करें।
राहु-केतुतुलसी घर के बीच में लगावेंरोज घी का दिया जलाकर मंत्रोच्चारण करें तुलसी पत्र का सेवन भी करें।

बुन्देलखण्ड में नक्षत्रों से संबंधित पौधे के ज्ञान राशि अनुसार

क्रमांकनक्षत्रदेवताराशिपौधे का नाम
संस्कृतहिन्दी
1.अश्विनीअश्विनीमेषकरकराकुचिला
2.भरणीयममेषधात्रीआंवला
3.कृतिकाअग्निमेष/वृषउदुंबरगूलर
4.रोहिणीब्रह्मावृषजंबूजामुन
5.मृगषिरासोमवृष/मिथुनखदिरखैर
6.आर्द्रारूद्रमिथुनकृष्णशीशम
7.पुर्नवसुअदितिमिथुन/कर्कवंशबांस
8.पुष्यबृहस्पतिकर्कअश्वत्थपीपल
9.अश्लेषासूर्यकर्कअश्वत्थनागकेशर
10.मघापितरसिंहवटबरगद
11.पूवी फाल्गुनीभ्रूमूसिंहपलाशढाक
12.उत्तरा फाल्गुनीअमियसिंह/कन्याप्लक्षपाकड़
13.हस्तसविताकन्याप्लक्षरीठा
14.चित्रात्वष्टाकन्या/तुलाबिल्बबेल
15.स्वामीवायुतुलाअर्जुनअर्जुन
16.विशाखाइन्द्रराग्नितुला/वृश्चिककटाई
17.अनुराधामित्रवृश्चिकबकुलमौलिश्री
18.ज्येष्ठाइन्द्रवृश्चिकसरलचीड़
19.मूलानिऋर्तिधनुसर्पसरल
20.पूर्वाषाढ़ाजलधनुकमलजलवेतस
21.उत्तराषढ़ावरवेदेवधनु/मकरपनसकठहल
22.धनिष्ठावभुमकर/कुंभशमीधायों
23.कल्पविष्णुमकरअर्कमदार
24.शत्भिषकवरूणकुंभकदमकदंब
25.पूर्वाभाद्रपदअजैकपदकुंभ/मीनआम्रआम
26.उत्तराभाद्रपदअहिबुधायमीननिंबनीम
27.रेवतीपूष्णमीनमधुकमहुआ
उपयोगी – पल्लव, पुष्प, फल, कांड

इन वृक्ष पौधों के विभिन्न पंचाग उपयोग में लाये जाते है। विशेषकर पल्लव, पुष्प, फल, कांड, के उपयोग अत्यधिक किये जाते हैं।

कई वृक्ष पौधों के समूल या बंध का भी तांत्रिक प्रयोग अद्भुत प्रभावशाली असरकारक चिकित्सा उपयोगी माना गया है।

प्रकृति के पास है अच्छे स्वास्थ्य की कला,

प्रकृति ही जीवन को सुखी, दीर्घायु, स्वस्थ रखती है।