बुन्देलखण्ड में गांव होय चाह शहर हमोंरे इते जो सब रिवाज है। ऐके सिवाय गांव में बैद्यराज जी बुलाये जात है उन्नई से रोगों के नुस्का बनबाकर दबाई खात हैं।

बैद्यराजजी –

  1. करेला, गुडमार, जामुन, मैथी, पलाश के फूल, जासोन के फूल सबसे मधुमेह (शक्कर की बीमारी) में खाये जात है।
  2. गाजर – भुई आवरो, पुनर्नवा, पथरचटा, मूत्र रोगों में भारी फायदा करत है।
  3. अर्जुन (कोहा)- अरे जो तो देखो पूरो झाड़ हृदय बीमारी ठीक करत है
  4. अशोक – अशोकारिष्ठ घर-घर में महिलायें सेवन करत हैं।
  5. हर्र बहेरा आंवला- (त्रिफला)- पाचन में और ताकत में बहुत फायदा करत है। सौंठ, काली मिर्च, पीपल, अदरख, तुलसी, कच्ची हल्दी, सौफ, आंवला, गुड़ सहित खासी में भारी फायदा करत है। मूंग की दार से तो कितनाउ लांघने कर लो।
  6. नीबू, अनार, केला, सेव, बिही, पपीता, मठा, दूध, जे तो पथ्य में खात हैं।

    “हमाओ केबो जो है के हमोरों के अपने पेड़ पौधों को इततो ज्ञान धरत हैं फिर दबाई में, पूजवे, खावे पीवे में उनकों ध्यान काये नहीं रखत, सबई पेड़ पौधा तो हमरे जीवन हैं तो बैद्ययों से पूछकें काये ने सुरक्षित भय जा रये। हजारों सालों से बैद्य इनकों ध्यान रखत आ रहे हैं मनों अंग्रेजों को शासन आओ अपने पौधों को महत्व खत्म कर दयो। अब वेतहासा काटन लगे।

तबई हे गांव गांव घने जंगल मैदान होत जा रये। काटवे वालों को और काटवे वारो को जेई पेड़ पौधा बड़े बूढ़ो की जान बचा सकते है चाहे पक्षी जनमानस, के होंय।

हमारो तो दोउ हाथ जोडकर आप ओरो से जो केबो है के निवेदन सोई है कि प्रकृति ने पेड़ पौधा अनेक पशु पक्षी जानवरो की रक्षा करो, उनकी रक्षा कर हो तो खुशी-खुशी रे हों। सबन खो खुशी ररखो के स्वस्थ राष्ट्र एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा, पर्यावरण सुरक्षा, के आयुर्वेद की रक्षा हुइये।”

           हमारे देश में प्रातः की दातून से रात्रि विश्राम तक इन पौधों का महत्व नीम, बबूल, करंज, मौलिश्री की दातौन से लेकर रात्रि विश्राम पूर्व इलायची, मुनक्का, केसर, कस्तूरीयुक्त दुग्धपान तक की व्यवस्था है। प्रसूता की एवं प्रसव पूर्व भी जीवनयापन की शैली प्राकृतिक वन्य औषधि एवं खाद्य पदार्थों पर आधारित है। महिलायें ग्रामों व वनों में गरीबी रेखा से जीवनयापन हेतु 60 प्रतिशत से अधिक मजबूर रहती है। वे अपने जीवन में गर्भकाल के दौरान प्रयोग होने वाले पेड़ पौधों को बटोरती हैं एवं प्रसवोत्तर उन्हें सेवन करती है।

         दशमूल द्रव्य, बिस्वार के लड्डू, चरुआ पानी, खैर की लकड़ी, बकायन का जल, नीम पत्र का प्रयोग, जन्मघुंटी, शहद आदि के प्रयोग होते हैं। शहद, तुलसी, अदरक, हर्र, वच, जायफल, कायफल इत्यादि के अनेकों प्रतिदिन नवजात शिशुओं को औषधि रूप में प्रयोग होते हैं। परम्परागत प्रकृति के 15 दिन मोती, (कर्ण सुहागा) सोना, चांदी, तांबा, पारा, गंधक, लौह, अभ्रक, शीशा आदि का प्रयोग हमारे देश की भारतीय चिकित्सा में हजारों वर्षों से स्थापित है।

         साथ ही पर्यावरण में उपलब्ध अधिक पेड़ पौधों का प्रभावी प्रयोग स्वास्थ्य समस्या के हल औषधि निर्माण, पंचकर्म, कायाकल्प, शोधन, संशमन, प्राकृतिक, यूनानी, होम्योपैथिक यहाँ तक कि ऐलीपैथिक (पश्चिमी) चिकित्सा में भी इसके बिना जीवित रहना असंभव बताया जाता है। कुछ औषधि पौधों का पारंपरिक ज्ञान व उपयोग उदाहरणार्थ कुछ इस प्रकार से है-

 

मातृ शिशु कल्याण – प्रसव, प्रसवोत्तर एवं नवजात शिशु स्वास्थ्य रक्षक है।

बिस्वार के लड्डू – पुराना गुड़, गन्ना, सौंठ, मखाना, छुहारा, चिरौंजी, किसमिस, काजू, गौंद, (नीम, बबूल, धाय इत्यादि), बादाम, पिस्ता, कमरकस, हल्दी, नारियल, शुद्ध घी, खसखस, दूध आदि अनेकों क्षेत्रवार शतापरी, असगंध, सौंठ, कालीमिर्च, भूसली, लौंग उपलब्धता अनुसार प्रसवोत्तर प्रयोग महिलायें करती है।

दक्षमूल काढ़ा – बेल की छाल, गंभारी की छाल, अरनी की छाल, गोखरु की छाल, छोटी व बड़ी कटेरी, पृष्निपर्णी, शालपर्णी, यवकुट, घी मिलाकर उबालकर पिलाया जाता है। यह गर्भाशय शोध एवं शोधन में लाभकर होता है।

चरुआ पानी – खैर की लकड़ी, अजवाइन, हल्दी, सौंठ, तांबे का पैसा पानी में उबालकर यह जल प्रसूता स्त्रियों को पिलाया जाता है। यह रक्त स्तंभक ही होता है।

नहाने का पानी – नीम, बकायन, गुड़बेल उबालकर स्नान कराना। प्रसूता को लाभप्रद माना गया है। यह गर्भाशय संकुचन में सहायक होता है।

जन्मघूंटी – बच्चों को कायफल, जायफल, सावित्री, छोटी हर्र, सुहागा, छुहारा, लैंडीपीपल, इत्यादि का उदर कृमि व श्वास जन्य रोगों के बचाव हेतु उपयोग है। अन्य प्रयोग औषधि पौधो के निम्नाकित हैं जैसे –

नीमपत्र – चर्मरोगी, बुखार, मलेरिया आदि में। कुष्ट रोग में भी उपयोग होता है।

नीमछाल – नेत्ररोग, खूनी बावासीर, चर्मरोगों में क्वाथ सेवन करते हैं।

नीम बीज – चर्मरोग, रक्त विकारों में उपयोगी होता है।

नीम फल – मेथी मिलाकर गुलकंद समान सेवा में पित्त शमक होता है।

नीम जड़ – इसका पेस्ट बनाकर बच्चों के नसों पर लेप करते हैं।

नीम गोंद – आधा चम्मच शहद, मक्खन में मिलाकर लाभकारी होता है। नीम व जलभी का सेवन एक साथ करना भी अत्यंत गुणकारी होता है।

अंजीर – यह एक पित्त रोगों को नष्ट करने वाला पौधा है, जिसका फल बहुत स्वादिस्ट होता है। वसा, हड्डियों, मधुमेह, विबंध, कब्ज में फायदेमंद होता है।

गाजर – गाजर भरपूर मात्रा में पायी जाती है, यह नेत्र, हृदय, केंसर, पाचन, स्वस्थ त्वचा, रोगा प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना, शारीरिक क्षमता बढ़ाना एवं दीर्घायु करती है।

अजवाइन – अजवाइन का पानी पेट की बीमारियों के लिए अत्यंत लाभप्रद होता है। जीरा पानी इसके साथ रामबाण होता है। हींग व अदरक भी दीपन-पाचन में सहयोग करती है। सोडा व नींबू का रस वायु की बीमारी में लाभकारी होता है।